स्वच्छता —(रितिक पान्डेय)

निकली टोली आज,

हम मातृभूमी के लालों की।

ज़ज्बा लेकर चले हैं हम,

सुंदर चमन बनाने को।।

चमक्ते सितारे के जैसा,

अपना वतन बनाने को।

निकली टोली आज हमारी,

सुंदर चमन बनाने को।।

साफ है दिल के, सच्चे हम,

अपने वतन के बच्चे अच्छे हम।

चलो साथीयों, निकले अब,

भारत को स्वच्छ बनाने को।

निकली टोली आज हमारी,

सुंदर चमन बनाने को।।

बाते कर ली बड़ी-बड़ी,

छोटी बात भूला दी है।

रास्ते पर खुद कूड़ा फेंका,

भाषण मे आसमान उठा ली है।।

वादा किया इन्होने,

स्वच्छ भारत बनाने को।

कूड़ा देखा सड़क पर,

शर्माते इसे उठाने को।।

समझाएँ क्या इन्हे हम,

क्या रह गया बताने को।

चलो साथीयों, निकले अब,

भारत को स्वच्छ बनाने को।।

मोदी जी की तैयारी है,

अब हमारी बारी है।

आओ मित्रों, आगे आओ,

भारत को स्वच्छ बनाने को।।

        Written by–(RITIK PANDEY)

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शायर की जवानी —(रितिक पान्डेय)

पल भर जीवन की कहानी है,
फिर मिट्टी मे मिल जानी,

मुझ शायर कि जवानी है।।

परेसान ना हो, जिंदगी से,

जिंदगी की वसुल बहुत पुरानी है।।

कभी गम आनी है, 

तो, कभी खुशीयाँ भी आनी है,

कहते हैं, ये जिंदगी बड़ी सयानी है।।

कभी हार आनी है, 

तो, कभी जीत भी आनी है,

यहीं तो जिंदगी की कहानी है।

फिर मिट्टी मे मिल जानी,

मुझ शायर की जवानी है।।

शायर रहे ना रहे,

वो लब्ज जीवित रह जानी है,

जो गुनगुनाए, मुझ शायर की जुबानी है।।

यहीं तो जिंदगी की कहानी है,

वर्षों के साथ, पल भर मे खो जानी है,

बाद मे, बस यादें रह जानी है,

ये जिंदगी की वसुल बहुत पुरानी है।।

         Written by–(RITIK PANDEY)

औरत एक संघर्ष —-(रितिक पान्डेय)

क्या कहुं, ऐ औरत तुझे,

निराली है, हर बात तेरी।

आधार है तुं प्रेम का,

स्नेह, मातृत्व की जननी है तु।

देवीयों का वरदान है तुं,

सृष्टी का सम्मान है तु।।

माँ तुं ही है, बेटी तु ही,

बहन तु ही है, पत्नी तु हीं।

निभाती इतने रिस्ते कैसे,

संघर्ष का दुसरा नाम है तु ही।।

महका देती है रिस्तों को,

चहका देती है घर-आँगन को।

ऐ औरत, वो फूल है तु हीं,

जो खुद तो, गम सह लेती है,

पर रिस्तों को, खुशीयों से भर देती है।।

ऐसा पौधा है, ऐ औरत तु।

जिस घर मे जाए, खुशीयाँ देती है।।

क्या कहुं, ऐ औरत तुझे,

बस इतना कहता हुं, तेरे सम्मान मे,

तुं चाहे तो झुका दे,

पर्वत और आसमान को,

अपने शान मे।।

एक संघर्ष भरी कहानी बयां करती है,

तेरी जिंदगी, 

ऐ औरत, तुझे सिर झुकाकर सलाम है।।

               Written by –(RITIK PANDEY)

बेवफा —(रितिक पान्डेय)

दिल की बातें,

दिल हीं जाने,

दिल कि है क्या

ख्वाहीशें ।।

जाने क्यों 

बिन बादलों के,

भीगा देती हैं

बारिशें ।।

उस बेवफा के

आँसुओं से

जल रहा 

एक आग है।।

हर सीने के

धड़कनों मे,

धड़कता एक 

राग है ।।

कहने को 

वो बेवफा,

मेरे ये दिल की

जान है।।

उस बेवफा के

आँसुओं से

जल रहा

एक आग है।।

   


     (Written by- RITIK PANDEY)

आजादी —(रितिक पान्डेय)

एक वक्त था,

जब गुलाम थे हम,
और हमारा देश।

बहुत रूलाया 

उस गुलामी ने

हमे और 

हमारे देश को।

अजा़ब बड़ा था,

देश के अफ़सानो का।

ज़रा भी अत्फ न था

उन अज़नबीयों को।

सर कलम कर दिया,

देश के क्रांतिकारीयों का।

देशवासीयों के अश्कों से 

भीगा दिया मातृभूमी को।

ज़रा भी अत्फ न था,

उन अज़नबीयों को।।

लड़ रहे थे हम,

अपने किस्मत से।

फिर असर आया 

इस लड़ाई का।

आगाज़ हुआ यहाँ से

हमारे विजय का।

लम्हे बीतते गये,

असर बढता गया।

एक दिन अन्त आया 

उन आसिम अज़नबीयों का,

जब लहु मे ज्वाला उठा

हमारे देश के 

क्रांतिकारीयों का।

संयोग आया फिर

देशवासीयों के आज़ादी का।

        Written by – RITIK PANDEY

मेघा ——(कवि- रितिक पान्डेय)

मेघा आ, मेघा आ,

अब तो हमको

ना तड़पा।

जल्दी से 

वषॊ ला,

फिर से धरा को,

स्वगॆ बना।।

तुझ बिन 

ये धरा,

हो गया है 

अधमरा।

अपनी मोती जैसी 

बूंदों से,

कर दे धरा को

हरा-भरा।।

मुझॊ से गये है,

ये पुष्प व कलियाँ।

सुनसान से 

हो गयें है,

तुझ बिन 

ये गलियाँ।।

कहती हैं ये,

पुष्प व कलियाँ,

महीनों हो गए,

मिले तुझसे।

रह पाएँ हम,

तुझ बिन कैसे।।

ऐसी क्या ,

खता हुई हमसे।

जो हमसे रूठ कर 

बैठा है कबसे।।

माफ कर 

हमारी खता को,

और मिलने आजा 

फिर हमसे।।

महका दे,

इन पुष्पों को,

चहका दे,

इन कलियों को,

जो मुझॊए 

बैठे हैं कबसे।।

अब तो आ,

ओ मेघा।

और धरा को,

स्वगॆ बना।।

बंजर सी भूमि पर,

फिर से 

हरीयाली ला।।

आ ओ मेघा,

अब तो आ।

और धरा को

स्वगॆ बना।।

              Written by –RITIK PANDEY

छाया धुप मे    —–(रितिक पान्डेय)

जब देखता हूं मै
छाया धुप मे,

याद आ जाते हैं

वो दिन,

जब भागा करता था मै,

कागज के टुकड़ों के

लोभ मे।

चैन-रैन 

सब छोड़ के,

कठोर पहाड़ को 

तोड़ के,

नैनों से नींद को

मोड़ के,

करता था मै

खूब मेहनत।

बैठ जाता था 

तब, किनारे पर,

मेहनत कर 

थक जाता जब।

फिर उठ कर

खड़ा हो जाता,

और काम पर

लग जाता,

बैठ कर 

सुस्ताने के बाद।

पुछते थे

मुझसे लोग,

क्या है, मुझ पर,

इतना बोझ,

जो मेहनत करता हुं,

इतना हर रोज।

              Written by– RITIK PANDEY