कश्मकश

ये घटा सी बिखरी हुई जुल्फे

जैसे संवरने को बेकरार बैठी हो।

मेहंदी रचाए, महबूब के नाम की

दुल्हन बनने की तयार बैठी हो।

यूं तो, लबों पर कश्मकश

और दिल की गहराई में छुपाए

एक राज बैठी हो।

ग़ालिब, क्या लिखे उसकी यादों में,

ये तो सच को झूठ

और झूठ को सच बताने को,

खोलकर सार बैठी हो।

ग़ालिब इनके झूठ को झूठ भी कैसे कहे,

ये लेकर काल रूप अकरार बैठी हो।

इन्हें दिल की बातें भी कैसे कहे

ये महबूब से कर तकरार बैठी हो।

बेकाबू मन बेपरवाह हो थिरक रहा है

बेकसी बेकत बेकाज़ बैठा है,

मानो, महबूब से वो

कर दर किनार बैठी हो।

नाक फुलाए बैठी

मनाए से मानती नहीं,

जैसे कर के इसरार बैठी हो।

ग़ालिब लिख रहा है

कोरे कागज़ पर उनकी खूबियां,

शायद वो भी दिल ही दिल में कर

इकरार बैठी हो।

written by:- RITIK PANDEY

झूठी मोहब्बत (MAMTA CHAUHAN)

(झूठी मोहब्बत)

एक बात बोलूं,अब पहले की तरह हम दोनों मैं वह बातें नहीं होती नसीब इतना बुरा है की चाहने से मुलाकात भी नहीं होती।

अगर तुम हमसे रूठ कर जाते या लड़कर जाते तो हम तुम्हें मना लेते, लेकिन तुमने तो हमें मुस्कुराकर छोड़ा है तो फिर किस हक से हम तुम्हारे पास आते।

आज मुझे भी तुमसे कुछ पूछना है, क्या मैं इतनी बुरी हूं की मुझे देखना तक नहीं चाहते और एक हम हैं जो तुम्हारे लिए रो-रो कर पागल हो गए।

लेकिन आज भी तुम्हारी जगह हम किसी और को नहीं दे पाते।

हर रोज तुझे याद करना, तेरी ही बातें करना, तेरी ही फिक्र करना यह कैसा पागलपन है।

जो इंसान आज मुझे सुनना भी नहीं चाहता कभी उसी ने कहा था की तुम खामोश मत रहा करो तुम्हारी खामोशी मुझे तोड़ देती है।

मेरी हर अदा की तारीफ करने बाला आज मुझ में हजारों कमियां निकालता है।

तेरे यूं छोड़ जाने के बाद कैसे मेरा दिल खुद को संभालता है यह तो बस मैं ही जानती हूं।

सोचा तेरी एक आवाज सुनु मुझे रोता हुआ देख तेरा यू मुस्कुराना आज दिल को बड़ी तकलीफ देती है।

बहुत सी बातें हैं जो मैं तुमसे कहना चाहती हूं लेकिन मेरी इन बातों को सुनने के लिए तुम्हारा यहां होना जरूरी है।

पर मैं यह कैसे भूल गई की तुम्हारे लिए मैं नहीं, तुम्हारे अपने जरूरी है।

तुम्हें एक आखरी बात और कहना चाहती हूं जिन नजरों से नजरअंदाज करते हो, उन्हीं नजरों से ढूंढते रह जाओगे।

देखना तो दूर मिलने को तरसा दूंगी तेरी झूठी मोहब्बत तुझे मुबारक अब मेरे सामने मेरी झूठी फिक्र मत जताना।

मर चुका है मेरा दिल अब तुम्हारे लिए अब अपनी गलतियों का पछतावा लेकर मेरे पास मत आना।

लेखिका:- ममता चौहान

कलम और एहसास

की एक दिन यूं ही हंसते-हंसते मुझे वो पल याद आया,

जब मेरी कलम ने कागज पर अपने एहसास लिख डाला।।

हुआ यूं, कि मैं बैठे-बैठे सोच रहा था बहुत गहराई में,

और कुछ करने को भी क्या था मेरी तन्हाई में।।

मै शिकार हुआ बैठा था, यकीन – ए – दोस्ती की,

अब कोई मजबूती नहीं थी मेरी खोजाई में।।

मेरी जिंदगी कालमोहरा में घिरी हुई दिखाई पड़ रही थी,

मानो, मेरी किस्मत पर अब कोहरे की रजाई चढ़ रही थी।।

अब मैं बिखर गया था टूट के,

शायद यह मेरे कर्मों की खुदाई चल रही थी।।

मैं अपने किस्मत गढ़ने वाले कुम्हरा को क्या दोष देता,

शायद मेरे आगे पीछे मेरे पूर्व जन्मों की बुराई चल रही थी।।

अन्हरा में बैठे कोश रहा था खुद को,

मुझे क्या पता, मेरे आने वाले दिनों की लिखाई चल रही थी।।

किससे कहता मै अपनी बेआवाज जिंदगी की ककहरा

अब तो जैसे प्रकृति भी गुंगबहरी होकर रोदन राग गा रही थी।।

मेरे हृदय में दबे एहसासों की लावा जैसे अब फूटने ही वाली हो,

आंखो के समक्ष लाल रक्त सी सूर्य की प्रकाश दिखाई पड़ रही थी।।

जाने – अंजाने में कलम की नोक पर बाजी लगा दिया,

काले बादल सी दिखाई पड़ने वाली स्याही, मुझे अलग से एहसासों में बांध रही थी।।

मेरी आंखो में नए एहसासों की लहर,

मानो, मेरी नई जिंदगी मुझे फिर से जीना सीखा रही थी।।

कलम और कागज हर पल मेरे साथ होते,

अब मै अपने एहसासों को, शब्दों में पिरोना सीख लिया था।।

कोरे कागज पर काले स्याही, “जो मेरे एहसासों से भरे थे” देखकर हैरान था,

कलम और कागज मेरे दोस्त थे, अब मै खुश होना सीख लिया था।।

(रितिक पांडेय)

आज हम बात करेंगे यूं ही डरा सहमा सा रहने वाला एक नासमझ लड़के के बारे में। यूं तो मां और पिताजी उसके सबसे अच्छे दोस्त थे और सारी बातें उनसे बताता था। कुछ वर्ष पश्चात वह कक्षा आठवीं में पहुंचा और उसकी रूचि खेलकूद संगीत अथवा नृत्य कला में बढ़ने लगी। अब उसके दोस्त भी बढ़ने लगे और वह अपने दोस्तों के साथ खेलता, ढेरों सारी बातें करता, और खुश रहता। ऐसे में वह अपने माता पिता को समय कम देने लगा और उनसे दूरियां बढ़ती गई।

एक दिन किसी कारणवश उसके दोस्त उसे छोड़कर चले गए। अब वह एकदम अकेला हो गया था।

✏तड़प ✏

सागर मे पानी है जितनी

आँखों मे आँसू है उतनी।।

सारा जहाँ भीग गया इन आँसूओं से

धक-धक करता दिल सिने मे।।

आँखों की नमी बयाँ करता हैं

ये दिल कहता है।।

होले-होले कहता है

सहमा-सहमा सा रहता हूँ।।

प्यार भी किया, इकरार भी किया,इंतज़ार भी किया,

उसने मेरे दिल पर हल्का सा वार भी किया।।

चोट दिया इस वार ने इतनी

भीगे बदन बरसात मे जितनी।।

बिखर गया मै, निखर गई वो

अश्क बहें नयनों से इतने, संवर गई वो।।

written by- RITIK PANDEY

सुनहरा मौसम (रितिक पान्डेय)

मौसम है,
सुनहरा मौसम है।

बादल फैला चारो ओर,

फिर भी,

किरने बिखरी पर्वतों पर।

तिरते इन बादलों को,

तीव्र गति से ये किरनें।

सुर्य की सुनहरी किरनें,

पहुँच गई धरा पर।।
मौसम है,

सुनहरा मौसम है।

इंद्र-धनुष के, सात रंगो मे,

लिपट गया है आसमां।

प्रेम सुधा का गीत गाता,

नृत्य कर रहा, ये जहां।।

पंख फैलाए,

मोर नाचते।

मधुर ध्वनि में,

कोयल गाती।

संगीत के, इन सात स्वरों मे,

घिर गया है आसमां।।
मौसम है,

सुनहरा मौसम है।

बच्चे गाते-मचाते सोर,

ध्वनि गूंजती चारो ओर।

मानो, लोगों से यह कहते,

अब हो गया भोर।।

मौसम है,

सुनहरा मौसम है।।

(Written by- RITIK PANDEY)

शिक्षक (रितिक पान्डेय)


जिसे देख
आदर से सर झुक जाए,

वो शिक्षक है।

जिवन के कठिन पथ पर

जो चलना सिखाए,

वो शिक्षक है।

जो हमें

प्रेम का पाठ पढ़ाए,

वो शिक्षक है।।

जो हमें

कठिन परिस्थितियों में भी

हँसना सिखाए,

वो शिक्षक है।।

मात-पिता का नाम है दूजा,

शिक्षक का सम्मान है पूजा।।

शब्द नहीं है शब्दकोष मे,

कैसे करूँ धन्यवाद आपका।।

हुँ जहाँ मै आज खड़ा,

है बड़ा योगदान आपका।।

इस योग्य बनाया है मुझे,

प्राप्त करूँ मै अपना लक्ष्य।।

जब भी लगा मुझे, मै हारा,

मात-पिता और आपने दिया सहारा।।

करलें कितनी भी उन्नती हम,

गुरू का महत्व ना होगा कम।।

इस विचार के साथ, शिश झुकाकर,

करता हुँ आपको सत्-सत् नमन।।

(written by- RITIK PANDEY)

मंजिल से दूर ___(रितिक पान्डेय)


मंजिल अभी दूर है,

उसे पाना भी जरूर है ।

है नए ,सपने कई ,

सपनो की राह

अभी दूर है ।

उसे पाना भी जरूर है ।।

प्रत्याशा मे हुँ,

अपने सपनों का ।

कहीं उसे पाने की मादकता

खंड-खंड न करदे ,

मेरे आशाओं की ईमारत

विखंड न करदे ।।

जो मिट जाऊँ मै

सपनों की प्रत्याशा मे

रोदन-राग न लिए फिरना ।

करना तुम एहसान मुझपर,

मेरे मात-पिता को 

साहस दिए फिरना ।।

रोदन-राग न लिए फिरना ।।

करना एक आखिरी 

एहसान मुझ पर ,

यत्न ,मेरे सपनों को 

पूर्ण करने का,

तुम जरूर करना ।।

जब आए, मेरी याद तुम्हे,

मेरी माँ को 

उसके दीपक का स्मरण 

जरूर कराना ।।

मेरे मात-पिता को

साहस दिए फिरना,

रोदन राग न लिए फिरना ।।

                   Written by–RITIK PANDEY

मेरी माँ      (कवि -रितिक पान्डेय)

जब उँगली पकड़

तुमने चलना सिखाया ।

मेरी माँ,

वो दिन याद आया,

और आँखों मे

आँसू लाया ।।

बावला था मै,

मेरी माँ,

जो तेरे प्यार को

समझ ना पाया ।।

माँ क्यों दूर हुआ,

मै तुझसे,

आज वो दिन

याद आया ।

और आँखों मे

आँसू लाया ।।
जब मै छोटा था,

तुमने हर सुख,

हर खुशी से

वाकीफ किया मुझे।

जब बड़ा हुआ,

मै तुम्हे समय न दे सका।
माफ कर मेरी माँ मुझे,

मै बड़ा बदनसीब था,

जो तेरे प्यार को

समझ न सका ।।
जब कभी 

मेरी आँखो मे 

आँसू आया ।

तुमने मुझे,

अपनी गोद मे खिलाया।
लेकीन आज तेरी याद मे

मै रो दिया ।।
मेरी माँ 

वो दिन याद आया,

और आँखो मे 

आँसू लाया ।।

                    (Written by- RITIK PANDEY)

स्वच्छता —(रितिक पान्डेय)

निकली टोली आज,

हम मातृभूमी के लालों की।

ज़ज्बा लेकर चले हैं हम,

सुंदर चमन बनाने को।।

चमक्ते सितारे के जैसा,

अपना वतन बनाने को।

निकली टोली आज हमारी,

सुंदर चमन बनाने को।।

साफ है दिल के, सच्चे हम,

अपने वतन के बच्चे अच्छे हम।

चलो साथीयों, निकले अब,

भारत को स्वच्छ बनाने को।

निकली टोली आज हमारी,

सुंदर चमन बनाने को।।

बाते कर ली बड़ी-बड़ी,

छोटी बात भूला दी है।

रास्ते पर खुद कूड़ा फेंका,

भाषण मे आसमान उठा ली है।।

वादा किया इन्होने,

स्वच्छ भारत बनाने को।

कूड़ा देखा सड़क पर,

शर्माते इसे उठाने को।।

समझाएँ क्या इन्हे हम,

क्या रह गया बताने को।

चलो साथीयों, निकले अब,

भारत को स्वच्छ बनाने को।।

मोदी जी की तैयारी है,

अब हमारी बारी है।

आओ मित्रों, आगे आओ,

भारत को स्वच्छ बनाने को।।

        Written by–(RITIK PANDEY)