स्वतंत्रता

याद करो
उन वीरों को,

जो जुझ रहे थे

गुलामी के दिनो को।

जुल्म बरस रहा था

उन पर,

हार नहीं माने पर वो।

राजमहल के अन्दर,

ऐरे-गैरे तन कर बैठे थे।

बुद्धिमान सब गांधी जी के,

बंदर बन कर बैठे थे।

फिर भी वो,

आजादी के टुटे-फुटे,

सपने लेकर बैठे थे।

चुपके-चुपके रोते थे,

पर साहस कभी न खोते थे।

अचानक आँधी एक दिन ऐसा आया,

ब्रिटिश शासन को

विनाश का रास्ता दिखाया।

भारत का किस्मत पलट गया तब,

ब्रिटिश शासन को हरा दिया जब।

भारत मे फिर से खुशीयां आया,

और स्वतंत्रता का पर्चम लहराया।।

               Written by- RITIK PANDEY

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वक्त की अहमीयत…….(रितिक पांडेय)

वक्त को अहमीयत न दी हमने कभी, 
जब वक्त था।

रूका रहा जिंदगी, चलता रहा वक्त।

रूका रहा जिंदगी, चलता रहा वक्त।

वक्त बहुत दूर जा चुका था हमसे,

और पीछे रह गए थे हम।

जब एहसास हुआ हमे, हमारी गलतीयो का,

तब वक्त ने मुंह मोड लिया था हमसे।

मुझे जरूरत था वक्त का, 

लेकिन वक्त ने मुझसे कहा,

“जब मै तेरे पास था,

तब तो कोई कदर नही था मेरा।

और जब दूर जा रहा हुं,

तब तुमने मुझे समझा है।

मेरी भी बेबसी है मित्र,

मै लौट कर नही आ सकता।

ना कोई मेरा अपना है,

ना कोई पराया,

मै सभी के पास जाता हुं।

जो मेरी कदर करता है,

वो दुनिया के साथ आगे बढता है,

जो मेरी कदर नही करता,

वो दुनिया कि भीड़ मे, 

कही खो जाता है।।”

              written by- RITIK PANDEY

जिंदगी खुली किताब है…..(रितिक पांडेय)

सोचा ही न था

कभी जिंदगी मे

मरने का ख्वाहिश रखुंगा।

सोचा ही न था कभी

हस्ते-हस्ते रो जाऊंगा।

चाहत तो खुब थी

तुम से मिलने कि

ऐ जिंदगी………।

पर सोचा ही न था कि

चलते-चलते गिर जाऊंगा।।

कहते है,

हाथ मे हाथ रख हमसाथ के

चलते रहना।

मंजिल आसां हो जाती है

पर सोचा नही था,

मिलते-मिलते बिछड जाएंगे हम।

कहा हा खुदा ने किसी से,

“जिंदगी खुली किताब है”

जो पढ पाए वो

पार हो जाए।

और, जो न पढ पाए

वो जीवन को 

काला अच्छर भैंस बराबर पाए।

बस ऐसी होती है ये जिंदगी

खुली किताब होती है ये जिंदगी।।

                 written by- RITIK PANDEY

रहस्यमयी

मै यहां हुं,
मै वहां नहीं हुं।

जहाँ ढुंढोगे,

वहाँ नहीं हुं।

याद करो मुझे,

कहीं न कहीं हुं।।

ढुंढोगे मुझे,

तो सारे जहाँ नही हुं।

हाँ, मै भगवान ही हुं,

लोग समझ नही पाते मुझे,

मै पहेली नही हुं।।

साथ देता हुं मै सबका,

मै सहेली नही हुं।

कोई शरीर नही है मेरा,

मै रहस्यमयी हुं।।

ना कोई पता है,

ना कोई ठिकाना,

जैसा हुं, मै सही हुं।।

मै यहाँ हुं,

मै वहाँ नही हुं,

जहाँ याद करोगे मुझे,

मै वही हुं।।

               Written by- RITIK PANDEY

आओ मिलकर पेड़ लगाएं

आओ मिलकर पेड़ लगाएं,
वातावरण को स्वच्छ बनाएं।

चारो ओर हरीयाली लाएं,

प्रकृति को ढलने से बचाएं।।

प्रकृति है बड़ा महान,

पेड-पौधे है इनकी शान।

इनमे भी होती है जान,

फिर भी क्यों काटे ईंसान।।

यह देते हमको मीठे फल,

बचाते है पृथ्वी से जल।

इन पर निभॆर है,

हमारा आज और कल।।

ये रहस्य प्रकृति का,

आज तु जान,

बडे फायदे इनसे तु मान।

इनमे भी होती है जान,

फिर भी क्यों काटे ईंसान।।

             written by- RITIK PANDEY

जीवन का रहस्य

है कठीन यह मागॆ,
लेकिन हम बढ रहे है।

इन ताकतवर आँधियों से,

अकेले हम लड़ रहे है।

जाएंगे हम वहाँ,

जहां जिंदगी लेकर जाएगी।

जैसे-तैसे बिछडने वालों की,

बस यादे रह जाएंगी।

क्या करेंगे हम,

इन धन-दौलत और

रिस्ते-नातों का,

जो मरने के बाद,

याद कभी न आएंगी,

याद कभी न आएंगी।।

           written by- RITIK PANDEY

प्रेम —–(रितिक पांडेय)

प्रेम ही जीवन की कथा रही,
प्रेम न मिलने की एक व्यथा रही।

प्रेमीयों ने दुनिया वालों कि बहुत अत्याचार सही,

लेकिन उनके दिल मे, प्रेम की अगन बनी रही।

उन्होने बता दिया दुनिया वालों को,

जो प्रेम को मिटा दे,

दुनिया मे ऐसा कोई अस्त्र नही।

और जो प्रेमीयो को हरा दे,

ऐसा कोई शश्त्र नही।

अब क्या कहु प्रेम के लिए,

जो अब तक नही कही।

बस इतना कहता हुं,

सलाम है उन प्रेमीयो को,

जिनकी प्रेम आज तक अमर रही।

                Written by- RITIK PANDEY